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प्रधानमंत्री का स्थानीय आत्मनिर्भरता का संदेश: वैद्य बालेंदु प्रकाश

उत्तराखंड में जड़ी बूटी का कृषिकरण करने से हो सकेगी उद्देश्य की पूर्ति

दुर्लभ एवं बहूमूल्य जड़ी बूटियों की खेती के लिए अनुकूल है उत्तराखंड की जल वायु और भौगोलिकी

कोविड-19 से उत्पन्न महामारी के चार माह के काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने पांच बार राष्ट्र को संबोधित किया|
उनके हाल के संबोधन में उनके द्वारा जहां एक ओर लोगों से कोरोना वायरस से बचने के उपायों को अपनाने पर जोर
दिया गया, वहीं लोगों को स्थानीय स्तर पर ही आत्मनिर्भर होने का संदेश भी दिया गया| प्रधानमंत्री का यह कथन
स्वागत योग्य है और उसमें देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान अपेक्षित है| एक आयुर्वेदिक चिकित्सक और विगत तीस
वर्षों से उत्तराखंड का निवासी होने के कारण मेरा कर्तव्य बनता है कि प्रधानमंत्री जी की भावनाओं के अनुरूप समय की
नजाकत को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाले रोजगार के विषय में अपने कर्तव्यों
का वहन करूँ|

उत्तराखंड राज्य के कुल क्षेत्र का लगभग 86 फ़ीसदी पहाड़ी क्षेत्र है, जिसमें गंगा, भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, यमुना,
भिलंगना, कोसी, पिंडारी और गोला नदी के साथ कई अन्य छोटी नदियां और असंख्य पानी के स्रोत हैं| उत्तराखंड का
कुल क्षेत्र का करीब 65 प्रतिशत वन क्षेत्र और 30 प्रतिशत कृषि क्षेत्र है| यहां पर राज्य की भौगोलिक और सामाजिक
संरचना के कारण बड़े कृषि भूमि के मालिकों की संख्या लगभग नगण्य है| ज्यादातर कृषकों के पास तीन से चार नाली
का क्षेत्र है, जिसमें वह जीवन निर्वाह हेतु पारंपरिक खेती करते हैं| परंतु पहाड़ की विषम परिस्थितियों, वन कानून, सीमित
आय के साधन तथा सड़क एवं यातायात की सुविधाओं से पहाड़ के निवासियों ने इस कष्टमय जीवन को त्याग मैदानी
क्षेत्रों की ओर पलायन करना शुरू किया है|

उत्तराखंड राज्य की धार्मिक एवं पर्यटन राज्य के रूप में एक अलग पहचान है, जहां पर बद्रीनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ,
हेमकुंड साहब, पिरन कलियार शरीफ, यमुनोत्री, गंगोत्री आदि प्राचीन धार्मिक स्थलों के साथ विभिन्न देवी-देवताओं के
स्थल हैं| सुदूर देशों एवं देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं का प्रतिवर्ष आना जाना लगा रहता है| उत्तराखंड के गढ़वाल
और कुमाऊं मंडल की मन मोहिनी प्राकृतिक छटा, सौम्य वातावरण तथा वन्य जीवन सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित
करता रहता है| यहां विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड कौसानी, गंगा यमुना के उद्गम
स्रोत के साथ असंख्य रमणीक स्थल है, जहां पर साहसिक गतिविधियों के साथ सैलानी प्रकृति की गोद में आते रहे हैं|

शिक्षा के क्षेत्र में भी उत्तराखंड का एक विशेष स्थान रहा है, जहां पर प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की
शिक्षा के लिए दूरवर्ती स्थानों से लोग आते रहे हैं| इस कड़ी में राज्य की राजधानी में स्थित दून, वेल्हम, भारतीय
वानिकी अनुसंधान संस्थान, भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, एच एन बी गढ़वाल विश्वविद्यालय,
कुमाऊं विश्वविद्यालय, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, जी बी पंत विश्वविद्यालय प्रमुखता से जाने जाते हैं|

सामरिक दृष्टि से भी, सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण, उत्तराखंड का विशेष स्थान है| यहाँ पर भारतीय सैन्य अकादमी जैसे
महत्वपूर्ण संस्थानों के साथ सीमा के प्रहरी जवानों का लगातार आना जाना रहता है| इन्हीं सब को मद्देनजर रखते हुए
प्रधानमंत्री जी ने यातायात को सुगम रखने के लिए 12000 करोड़ रुपए की लागत के ऑल वेदर रोड के निर्माण को
प्रारंभ कराया है| इसी के साथ राज्य में रेलवे सेवाओं का पर्वतीय क्षेत्रों में विस्तार भी श्री नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्रित्व
काल में प्रारंभ किया जा चुका है| इन सब गतिविधियों से कुछ हद तक स्थानीय लोगों को रोजगार मिले हैं| हाल के वर्षों
में, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से तथा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाले खाद्य पदार्थों के पोषक गुणों को
देखते हुए उनकी मांग बढ़ी है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के साधनों में बढ़ोतरी हुई है|

इन सब के बावजूद भी राज्य से पलायन हुए लोगों की वापसी में कोरोनावायरस से उत्पन्न वर्तमान दशा की प्रमुख
भूमिका है| इसके विस्तार के लिए राज्य की अनमोल धरोहर ‘जड़ी-बूटी उद्योग’ उल्लेखनीय भूमिका निभा सकती है|
आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद पिछले कुछ दशकों में विश्व भर में परंपरागत चिकित्सा की
तरफ रुझान बढ़ा है| जिससे प्रकृति में उत्पन्न होने वाली जड़ी बूटियों का वार्षिक व्यवसाय करीब 14 बिलियन डॉलर (10
खरब रुपये) का होने के साथ और 8.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि प्राप्त कर रहा है| यह बात दीगर है कि इसमें भारत का
हिस्सा मात्र 3 प्रतिशत ही है|

उत्तराखंड राज्य के गठन से पूर्व और पश्चात राज्य में जड़ी-बूटी उत्पादन, भंडारण एवं विपणन को एक संसाधन के रूप
में जाना जाता रहा है| देश के वर्तमान मानव संसाधन मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल
में जड़ी-बूटी को एक संपदा के रूप में देखते हुए उत्तराखंड को ‘जड़ी-बूटी राज्य’ के रूप में स्थापित करने का नारा भी
दिया था| दुर्भाग्य से इस बहुआयामी परियोजना पर जमीनी स्तर पर कार्य नहीं हो सका| दिसंबर 2019 में सूचना के
अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी से बेहद ही निराशाजनक सूचना प्राप्त हुई है| राज्य में सात मूल्यवान
एवं दुर्लभ प्रजाति उत्पादन के लिए चिन्हित की गई है, जिनमें से मात्र चार कुटकी, कूठ, अतीस एवं पीपली का ही दस
वर्ष पूर्व उत्पादन प्रारंभ किया गया था | इसमें से कुटकी की पैदावार जो वर्ष 2010 में 21,20,000 थी, 2015 में
1,66,000 और 2016 से 2018 तक 50,000 पौध प्रतिवर्ष रही और 2019 में मात्र 5000 ही रह गई| कूठ और अतीस
की संख्या 2010 में 10,88,000 और 12,95,000 एवं वर्ष 2015 में डेढ़ लाख और बीस हज़ार की जगह वर्ष 2019 में
पाँच हज़ार की निम्नतक संख्या पर पहुँच गयी | आयुर्वेदिक औषधियों और रसोई घरों में इस्तेमाल होने वाली पीपली की
संख्या 2011 में 92,000 और 2015 में 72,560 से 2019 में शून्य पर पहुँच गयी | बाकी तीन प्रजातियों के उत्पादन
का ख़ाता अभी तक राज्य में नहीं खुल सका है|

केंद्र और राज्य सरकार मिलकर जड़ी बूटीयों के उत्पादन पर 12 करोड़ वार्षिक व्यय करते हैं, परंतु व्यय और आमदनी के
हिसाब से वर्तमान दशा अत्यंत शोचनीय है| उत्तराखंड राज्य में जैविक रूप से उत्पादित अनाज, फल-फूल एवं सब्जियों
की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी मांग है| परंतु मौसम की अनिश्चितता तथा सुदूर पर्वतीय स्थानों से यातायात
के साधन ना होने से उत्पादों को गंतव्य तक पहुंचने में परेशानी होती है| उचित भंडारण व्यवस्था ना होने के कारण भी
कई बार उत्पादन करने वाले कृषक को हानि उठानी पड़ती है| इस प्रकार की पृष्ठभूमि में वर्तमान के वन कानून के
कारण वन्य जीवों से इन फसलों को बचाना भी अत्यंत चुनौतीपूर्ण है| इन तमाम पृष्ठभूमि में उत्तराखंड के ढाई हजार
फीट से उँचे कृषि क्षेत्र में जड़ी बूटी की संगठित पैदावार राज्य की आर्थिकी को एक नया आयाम दे सकती है|

अध्ययनों के अनुसार आयुर्वेद में बहुतायत में प्रयोग होने वाली कुटकी का उत्पादन एक नाली क्षेत्र में लगभग 20 किलो
होता है| कुटकी की वर्तमान वैश्विक माँग 375 टन है, जिसमें भारत का वार्षिक योगदान करीब 70 टन है और उत्तराखंड
का मात्र 7 टन| आजकल बाजार में इसका भाव ₹ 2000 प्रति किलो है, जिसमें कृषक को लगभग ₹ 800 प्रति किलो
मिल सकता है| अर्थात 20 नाली वाले क्षेत्र के किसान को कुटकी की पैदावार से ₹ 3,20,000 की प्रतिवर्ष आमदनी हो
सकती है| कृषि आय होने के कारण इस पर कोई टैक्स भी नहीं होता| उत्तराखंड राज्य मैं पैदा हुई कुटकी से भारत से
होने वाली वैश्विक आपूर्ति पूरी करने के लिए हमें यहाँ 3500 नाली क्षेत्र में कुटकी की खेती करनी होगी| वैश्विक माँग के
अनुसार उत्तराखंड राज्य में 375 टन कुटकी की पैदावार सुनिश्चित कर लगभग 40 करोड़ की वार्षिकआय कृषक स्तर पर
संभव हो सकती है| इसी प्रकार आयुर्वेद में प्रयोग होने वाले सालम पंजा, जटामांसी, जदवार, अतीस, चिरायता का देश में
उत्पादन ना होने के कारण आयात किया जाता है| जबकि इन की पैदावार हेतु उपयुक्त मौसम, भौगोलिकी और मानव
संसाधन स्थानीय स्तर पर भली-भांति उपलब्ध है|

जड़ी बूटी उत्पादन के लिए संसाधनों की कम इच्छाशक्ति, धैर्य और परिश्रम की ज्यादा आवश्यकता है| राज्य सरकार यदि
मनरेगा के अंतर्गत जड़ी-बूटी के उत्पादन को शामिल कर प्रत्येक जड़ी-बूटी के प्राकृतिक उत्पादन क्षेत्र में पौधशाला स्थापित
करने का प्रबंध करे, तो आगामी वर्षों में स्थानीय कृषकों को तथाकथित जड़ी बूटी की खेती करने के लिए पौधे एवं बीज
उपलब्ध हो सकेंगे| दो वर्ष पूर्व 100 कृषकों को 20 नाली क्षेत्र में कुटकी पैदा कर एवं निश्चित समर्थन मूल्य पर कुटकी
खरीदने का ऐसा ही एक प्रयास किया गया था| परंतु कुटकी के मात्र अड़तालीस लाख पौधे मिल पाए थे, जो निर्धारित क्षेत्र
के एक चौथाई क्षेत्र के लिए भी पूरे नहीं थे|

प्रधानमंत्री जी का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि हमको अब कोविड-19 उत्पन्न परिवेश में अपनी सोच और कार्यशैली में
बदलाव कर स्थानीय स्तर पर स्वावलंबन का पाठ पर आत्मनिर्भर बन कर अपने जान और जहान की सुरक्षा करनी होगी|

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